Friday, 28 August 2015

15 लाख का सपना

कुछ दिन पहले सुना कि किसी ने कहा है मेरे खाते में भी 15 लाख आएंगे फिर मैं भी अमीर बन जाऊंगा
कल रात सोचते सोचते सो गया कि काश ये सच होता.....
रात को सपना आया मैंने देखा कि मेरे मोबाइल में SMS आया कि भारत सरकार ने 15 लाख मेरे "जान धन योजना वाले बैंक खाते में डिपाजिट कर दिए है मैं बड़ी ख़ुशी से उछलता हुआ कमरे से बाहर आया
सबको बोला "देखो देखो अच्छे दिन आ गए
मेरे र अकाउंट में 15 लाख आ गए"
घर वाले बोले ज्यादा खुश न हो
हमारे सबके खाते में भी 15 लाख आये है ये देखो...... कसम से बड़ा दुःख हुआ मुझे
फिर सोचा चलो दोस्तों को दिखाता हूँ
दोस्त बोले ज्यादा ना उछल हमारे खाते में भी 15 लाख हैं......सारी ख़ुशी फिर गायब
फिर सोचा चलो दूकान पर खूब सामान लेता हूँ
"भाई साहब ये रामू चाचा की दूकान क्यों बंद है" एक आदमी बोला भाई रामू चाचा ने तो दूकान बंद कर दी उन्हें अब दूकान की क्या जरूरत उनके खाते में तो 15 लाख आ गए
मे अब काम नही करना पड़ेगा.......
फिर सोचा चलो शॉपिंग माल में चलता हूँ
वहां देखा तो सब दुकान बंद थी उन लोगों को भी 15 लाख मिल गए थे.....
सोचा कोई बात नही होटल में खूब खाना खाता हूँ अपनी पसन्द का
अंदर देखा सब लोग जा चुके थे सिक्यूरिटी गार्ड भी नही था मतलब वो भी अमीर बन गया था उसके पास भी अब 15 लाख थे
बाजार गया तो सब रेहड़ी वाले चाय वाले
जूस वाले सब्जी वाले सब काम छोड़कर बैंक में जा चुके थे रूपये लेने क्योंकि अब किसी को काम करने की कोई जरूरत नही थी सबके पास "15 लाख" रूपये थे
शहर से बाहर गया तो सब फैक्ट्री बंद सब मजदूरों को 15 लाख मिल चुके थे सब नाच गा रहे थे......
"अच्छे दिन आ गए... अच्छे दिन आ गए"
शाम को खेतो की तरफ गया तो खेत में कोई नही था सब किसान खेती छोड़ कर घर जा चुके थे अब उनको धुप बारिश में काम करने की कोई जरूरत नही थी वो भी अमीर बन चुके थे
हास्पिटल देखा वहां डॉक्टर ताश खेल रहे थे पूछने पर बोले हमे कोई इलाज़ नही करना अब 15 लाख काफी जीवन भर के लिए....
फिर 5 दिन बाद पता चला अचानक लोग भूख से मरने लगे है क्योंकि खेत में सब्जी नही उग रही सब राशन की दुकान बंद है होटल ढ़ाबे भी बंद पड़े हैं
लोग बीमारी से मरने लगे हैं क्योंकि डॉक्टर भी नही हैं पशु भी भूख से मर रहे है खेत से चारा नही मिल रहा बच्चे भी भूख श से रो रहे है क्योंकि पशु दूध नही दे रहे लोग सड़को पर भागे फिर रहे है 1-1 लाख रूपये हाथ में लिए
"ये लो भाई 50 हज़ार रूपये 100 ग्राम दूध दे दो दिन से बच्चा भूख से मर रहा है
फिर 10 दिन बाद लोग मरने लगे कुछ जिन्दा लोग सड़कों पर रुपयों का बेग लिए घूम रहे है भाई ये लो ये लो 5 लाख रूपये हमे बस 5 किलो गेहूं देदो 10 दिन से भूखे हैं सब बाजार बंद हो चुके है अनाज नही है किसी के पास.....
सब तरफ मुर्दा लोग दिख रहे है
और मैं भी अपने "15 लाख" रूपये लिए भागा जा रहा हूँ.... लेलो भाई लेलो ये "15 लाख" बस रोटी का एक टुकड़ा देदो......
इतने में माँ की आवाज़ आई
"उठ जा कमीने कब से चारपाई को लात मार रहा है मर गया मर गया.... की आवाज़ लगा रहा है कोई बुरा सपना देखा क्या ?
नही माँ बुरा नही "अच्छे दिनो" का सपना देखा
उनसे अच्छे तो ये "बुरे दिन" हैं गरीब सही मगर घर में अनाज तो है पानी है बच्चे खेल रहे हैं पशु खेत में चर रहे हैं दुकानों पर भीड़ है
लोग आ जा रहे हैं......
चल पड़ा मैं भी अपने काम पर ये सोचते हुए
काश ! 
ये "15 लाख" कभी भी किसी के खाते में न आये तो अच्छा है वरना फिर काम कौन करेगा जब सबके पास "15 लाख" होंगे..



एक आश्रम के बाहर बड़ा सा पत्थर पड़ा था।कई लोग उससे टकराए ,किसी की गाड़ी का टायर कट गया तो किसी की साइकिल पलट गयी।सब उस पत्थर को व उस पत्थर को रखने वाले को कोसते और गलियां देते व आगे निकल जाते।एक सब्जी बेचने वाला भी वहां से गुजरा उसके सिर पर सब्जियों से भरा टोकरा था जैसे ही वह पत्थर से टकराया उसकी सारी सब्जियां सड़क पर बिखर गयी।पहले उसने सब्जियां अपने टोकरे में भरी और फिर उस पत्थर को उठाने की कोशिश करने लगा।पत्थर हटाते समय वह केवल यहीं सोच रहा था कि कहीं मेरी तरह किसी और को भी चोट ना लग जाए।आखिर अपने अथक प्रयास से वह उस पत्थर को हटाने में सफल हो गया तो उसने एक कागज देखा जिस पर लिखा था धन्यवाद तुमने बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करने के इरादे से इस भारी पत्थर को हटाया है।इसलिए यह ईनाम स्वीकार करो।उसने जैसे ही कागज को खोला उसमें से एक हजार का नोट मिला।
हम अपने जीवन में दिखावा तो बहुत करते है लेकिन सही मायने में ऐसा कोई काम नहीं कर पाते जिसके लिए लोग हमें दिल से धन्यवाद कह सके,हमारी प्रशंसा कर सके।हम अच्छे कपडे पहनते है ,अच्छा घर बनाते है ,बड़ी सी गाड़ी रखते है ताकि लोग हमें सराहे।माना कि सजा हुआ घर सजे हुए लोग ,चमचमाती कार सबको बहुत अच्छी लगती है और सब उसकी तारीफ़ भी करते है।लेकिन क्या सही मायने वे हमारी प्रशंसा कर पाते है।जिसके पास ये सारी चीजे है लोग उनसे ईर्ष्या तो कर सकते है उनसे प्यार नहीं करते और प्रशंसा भी मुहं देखी करते है।भले ही हमने यह सब कुछ बहुत मेहनत व ईमानदारी से पाया हो।
जब तक हम निस्वार्थ भाव से लोगों के काम नहीं आयेगें तब तक हम सच्ची प्रशंसा व लोगों का प्यार पाने काबिल नहीं हो सकते।


प्राचीन जापान में एक सम्राट बहुत सनकी था। वह छोटी-छोटी गलतियों के लिए बड़ा दंड दे देता था। इसलिए प्रजा उससे बहुत भयभीत रहती थी। सम्राट के पास बीस फूलदानियों का एक अति सुंदर संग्रह था, जिस पर उसे बड़ा गर्व था। वह अपने महल में आने वाले अतिथियों को यह संग्रह अवश्य दिखाता था।
एक दिन फूलदानियों की नियमित सफाई के दौरान सेवक से एक फूलदानी टूट गई। सम्राट तो आगबबूला हो गया। उसने सेवक को फांसी पर लटकाने का हुक्म दे दिया। राज्य में खलबली मच गई। एक फूलदानी टूटने की इतनी बड़ी सजा पर सभी हैरान रह गए। सम्राट से रहम की अपील की गई, किंतु वह नहीं माना।
तब एक बूढ़ा आदमी दरबार में हाजिर होकर बोला, ‘सरकार! मैं टूटी हुई फूलदानी जोडऩे में सिद्धहस्त हूं। मैं उसे इस तरह जोड़ दूंगा कि वह पहले जैसी दिखाई देगी।’ सम्राट ने प्रसन्न होकर बूढ़े को अपनी शेष फूलदानियां दिखाते हुए कहा, ‘इन उन्नीस फूलदालियों की तरह यदि तुम टूटी हुई फूलदानी को भी बना दोगे तो मुंहमांगा इनाम पाओगे।’
सम्राट की बात समाप्त होते ही बूढ़े ने अपनी लाठी उठाई और सभी फूलदानियां तोड़ दीं। यह देखकर सम्राट क्रोधावेश में कांपते हुए बोला, ‘बेवकूफ! ये तुमने क्या किया?’ बूढ़े ने दृढ़ता के साथ कहा, ‘महाराज! इनमें से हर फूलदानी के पीछे एक आदमी की जान जाने वाली थी। तो मैंने अपने इंसान होने का फर्ज निभाते हुए उन्नीस लोगों के प्राण बचा लिए। अब आप शौक से मुझे फांसी की सजा दे सकते हैं।’
बूढ़े की चतुराई और साहस देखकर सम्राट को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने बूढ़े तथा सेवक दोनों को माफ कर दिया। बुराई से लडऩे के लिए साहस और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। यदि निर्भीकता से डटकर खड़े रहें तो बुराई का अंत अवश्य होता है..

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