आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं
एक दिन उन्होंने पारस पत्थर की कहानी अपने सभी शिष्यों को सुनाई | इस पत्थर के बारे में जानने के लिए सबसे अधिक जिज्ञासु वही शिष्य था | यह देख गुरु उसकी मंशा समझ गये | वे समझ गये कि यह आलसी हैं इसलिए उसे इस जादुई पत्थर की लालसा हैं | लेकिन ये मुर्ख यह नहीं जानता कि जो व्यक्ति कर्महीन होता हैं | उसकी सहायता तो स्वयं भगवान् भी नहीं कर सकते और ये तो बस एक साधारण पत्थर हैं | यह सोचते- सोचते गुरु ने सोचा कि यही सही वक्त हैं इस शिष्य को आलसी के अवगुणों से अवगत कराने का | ऐसा सोच गुरु जी ने उस शिष्य को अपनी कुटिया में बुलवाया |
कुछ क्षण बाद, कुटिया के भीतर शिष्य ने प्रवेश किया और गुरु को सिर झुकाकर प्रणाम किया | गुरु ने आशीर्वाद देते हुए कहा – बेटा ! मैंने आज जिस पारस पत्थर की कहानी सुनाई वो पत्थर मेरे पास हैं और तुम मेरे प्रिय शिष्य हो इसलिए मैं वो पत्थर सूर्य उदय से लेकर सूर्यास्त तक के लिए तुम्हे देना चाहता हूँ | तुम उससे जो करना चाहों कर सकते हो | तुम्हे जीतना स्वर्ण चाहिये तुम इस पत्थर से इस दिए गये समय में बना सकते हो | यह सुनकर शिष्य की ख़ुशी का ठिकाना न था | गुरु जी ने उसे प्रातः सूर्योदय होने पर पत्थर देने का कहा |रात भर वह इस पत्थर के बारे में सोचता रहा |
दुसरे दिन, शिष्य ने गुरु जी से पत्थर लिया और सोचने लगा कि कितना स्वर्ण मेरे जीवन के लिए काफी होगा ? और इसी चिंतन में उसने आधा दिन निकाल दिया | भोजन कर वो अपने कक्ष में आया | उस वक्त भी वह उसी चिंतन में था कि कितना स्वर्ण जीवनव्यापन के लिए पर्याप्त होगा और यह सोचते-सोचते आदतानुसार भोजन के बाद उसकी आँख लग गई और जब खुली तब दिन ढलने को था और गुरूजी के वापस आने का समय हो चूका था | उसे फिर कुछ समझ नहीं आया | इतने में गुरु जी वापस आ गये और उन्होंने पत्थर वापस ले लिया | शिष्य ने बहुत विनती की लेकिन गुरु जी ने एक ना सुनी | तब गुरु जी ने शिष्य को समझाया पुत्र ! आलस्य व्यक्ति की समझ पर लगा ताला हैं | आलसी के कारण तुम इतने महान अवसर का लाभ भी ना उठ सके जो व्यक्ति कर्म से भागता हैं उसकी किस्मत कभी उसका साथ नहीं देती | तुम एक अच्छे शिष्य हो परन्तु तुममे बहुत आलस हैं | जिस दिन तुम इस आलस के चौले को निकाल फेकोगे | उस दिन तुम्हारे पास कई पारस के पत्थर होंगे | शिष्य को गुरु की बात समझ आगई और उसने खुद को पूरी तरह बदल दिया | उसे कभी किसी पारस की लालसा नहीं रही |
परिश्रम का फल मीठा होता है
बच्चा बोला , ” मुझे भूख लगी है , क्या आप मुझे खाने के लिए कुछ पत्तियां दे सकते हैं ?”
बन्दर मुस्कुराया , ” मैं दे तो सकता हूँ , पर अच्छा होगा तुम खुद ही अपने लिए पत्तियां तोड़ लो. “
” लेकिन मुझे अच्छी पत्तियों की पहचान नहीं है .”,
बच्चा उदास होते हुए बोला . “तुम्हारे पास एक विकल्प है , ”
बन्दर बोला , ” इस पेड़ को देखो , तुम चाहो तो नीचे की डालियों से पुरानी–कड़ी पत्तियां चुन सकते हो या ऊपर की पतली डालियों पर उगी ताज़ी -नरम पत्तियां तोड़ कर खा सकते हो .” बच्चा बोला , ”
ये ठीक नहीं है , भला ये अच्छी – अच्छी पत्तियां नीचे क्यों नहीं उग सकतीं ,
ताकि सभी लोग आसानी से उन्हें खा सकें .?”
“यही तो बात है , अगर वे सबके पहुँच में होतीं तो उनकी उपलब्धता कहाँ हो पाती … उनके बढ़ने से पहले ही उन्हें तोड़ कर खा लिया जाता !”,
” बन्दर ने समझाया .
”लेकिन इन पतली डालियों पर चढ़ना खतरनाक हो सकता है ,
डाल टूट सकती है ,
मेरा पाँव फिसल सकता है ,
मैं नीचे गिर कर चोटिल हो सकता हूँ …”बच्चे ने अपनी चिंता जताई
बन्दर बोला , “सुनो बेटा , एक बात हमेशा याद रखो , हम अपने दिमाग में खतरे की जो तस्वीर बनाते हैं अक्सर खतरा उससे कहीं कम होता है .“
“पर ऐसा है तो हर एक बन्दर उन डालियों से ताज़ी पत्तियां तोड़कर क्यों नहीं खाता ?”
बच्चे ने पुछा . बन्दर कुछ सोच कर बोला ”
क्योंकि , ज्यादातर बंदरों को डर कर जीने की आदत पड़ चुकी होती है , वे सड़ी -गली पत्तियां खाकर उसकी शिकायत करना पसंद करते हैं पर कभी खतरा उठा कर वो पाने की कोशिश नहीं करते जो वो सचमुच पाना चाहते हैं …. पर तुम ऐसा मत करना ,
ये जंगल तमाम सम्भावनाओं से भरा हुआ है ,
अपने डर को जीतो और जाओ ऐसी ज़िन्दगी जियो जो तुम सचमुच जीना चाहते हो !”
बच्चा समझ चुका था कि उसे क्या करना है , उसने तुरंत ही अपने डर को पीछे छोड़ा और ताज़ी- नरम पत्तियों से अपनी भूख मिटाई।
Prayashchit
बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा। सेठ को हुआ कि इतना पाप हो रहा है तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।
एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।
साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था।
सेठ ने कहाः
"महाराज !
अभी आराम कीजिए।
थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा।"
साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली।
सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।
साधु बाबा आराम करने लगे।
खीर थोड़ी हजम हुई।
चोरी के चावल थे।
साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली।
शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।
सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवत्पुरुष थे, वे क्यों लेंगे ?
नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।
इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः
"नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।"
सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे?
जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।"
साधुः "यह #दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।
सेठ ! तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?"
सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी।
साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया।
सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि
'हे राम.... यह क्या हो गया ? मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी।
इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया।"
इसीलिए कहते हैं किः
"जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन।
जैसा पीओ पानी वैसी होवे वाणी।"
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