अगर जींदगी मे कुछ पाना हो तो,,,तरीके बदलो....., ईरादे नही..
जब सड़क पर बारात नाचरही हो तो हॉर्न मार-मार के परेशान ना हो......गाडी से उतरकर थोड़ा नाच लें...,मन शान्त होगा। टाइम तो उतना लगना ही है..!
इस कलयुग मेंरूपया चाहे कितना भी गिर जाए, इतना कभी नहीं गिर पायेगा,जितना रूपये के लिए इंसान गिर चूका है...
सत्य वचन.... रास्ते में अगर मंदिर देखो तो,,,प्रार्थना नहीं करो तो चलेगा ..पर रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना,,,शायद कोई जिन्दगी बच जाये.
जिसके पास उम्मीद हैं,वो लाख बार हार के भी,नही हार सकता..!
बादाम खाने सेउतनी अक्ल नहीं आती...जितनीधोखा खाने से आती है.....!
एक बहुत अच्छी बातजो जिन्दगी भर याद रखिये,,,आप का खुश रहना ही आप का बुरा चाहने वालों के लिएसबसे बड़ी सजा है....!
खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते,अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते...!
KUCHH SIKH
एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी |
कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच रही हो ? “
महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ | “
कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप और मटके में ? “
महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है| “
कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? “
महिला : ” आठ पाप इस मटके में है | मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप … और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है|”
अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ : ” पैसे देकर लोग पाप ले जाते है ?“
महिला : ” हाँ , महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है | “
कालिदास : ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है ? “
महिला : ” क्रोध ,बुद्धिनाश , यश का नाश , स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय , चोरी , असत्य आदि दुराचार , पुण्य का नाश , और स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है | “
कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है | किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप होते है |
वे बोले : ” आखिरकार इसमें क्या है ? ”
महिला : ” महाराज ! इसमें शराब है शराब ! “
कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले : ” तुझे धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है और ‘मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते है |
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ज़रूर पढ़ें, बड़ी ही गहरी बात लिख दी है किसी शक्शियत नें ...
बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में , उसी देहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।
सजाया गया था चमचमाते झालर से मस्जिद और चमकते चादर से दरगाह को, बाहर एक फ़कीर को भूख और ठंड से तड़प के मरते देखा है ।।
लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार , पर बहार एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।
वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हाल के लिए , घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई बदलते देखा है।
सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को, आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।
जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन , आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है ।
जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी , आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा है ।
दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस बेटी को जबरन बाप ने, आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है ।
मारा गया वो पंडित बेमौत सड़क दुर्घटना में यारो , जिसे खुदको काल सर्प, तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है।
जिस घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों , आज उसी आँगन में खिंचती दीवार को देखा है।
बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर, अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आएगा।
आत्महत्या कर ली गिरगिट ने सुसाइड नोट छोडकर, अब इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता !
गिद्ध भी कहीं चले गए लगता है उन्होंने देख लिया कि, इंसान हमसे अच्छा नोंचता है।
कुत्ते कोमा में चले गए, ये देखकर, क्या मस्त तलवे चाटते हुए इंसान देखा है । माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती... यहाँ आदमी आदमी से जलता है...!!


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